Shardiya Navratri 2020: 17 Oct से नवरात्रि प्रारंभ,कलश स्‍थापना का शुभ मुहूर्त जानें

Publish Date: 16 Oct, 2020
 

Navratri 2020 : पितृ पक्ष (Pitr Paksh) की अमावस्या (Amavasya) के बाद से ही हर साल आश्विन मास (Ashwin maas) की नवरात्रि (Navratri) शुरू हो जाती है, और कलश स्थापना  (kalash sthaapana) की जाती है। लेकिन, इस साल ऐसा नहीं होगा। 17 सितंबर (यानी कि आज) को सर्वपितृ मोक्ष अमावस्या (Sarvapitr Moksh Amaavasya) है। इसके बाद 18 तारीख से अधिकमास (Adhikamaas) शुरू हो जाएगा। ये महीना 16 अक्टूबर तक रहेगा। अधिकमास  (Adhikamaas ) लगने से नवरात्रि (Navratri) 20-25 दिन आगे हो गए हैं। इस बार  शारदीय नवरात्र (Shaaradeey Navaraatr) 17 अक्टूबर  से शुरू होंगे। इससे पहले 18 सितंबर से 16 अक्टूबर तक अधिकमास (Adhikamaas) रहेगा। ज्योतिषाचार्य अनीष व्यास ने बताया कि दरअसल लीप वर्ष (Leap Year) होने के कारण ऐसा हो रहा है।

ज्योतिष की मानें तो 165 साल बाद लीप ईयर और अधिकमास (Adhikamaas) दोनों ही एक साल में हो रहे हैं। इस महीना में कोई बड़ा त्योहार नहीं रहेगा। इस साल 17 सितंबर 2020 को श्राद्ध खत्म होंगे। इसके अगले दिन अधिकमास (Adhikamaas) शुरू हो जाएगा, जो 16 अक्टूबर तक चलेगा। इसके बाद 17 अक्टूबर से नवरात्रि व्रत (Navratri Vrat) रखें जाएंगे। इसके बाद 25 नवंबर को देवउठनी एकादशी होगी। जिसके साथ ही चातुर्मास समाप्त होंगे। इसके बाद ही शुभ कार्य जैसे विवाह, मुंडन आदि शुरू होंगे। आपको बता दे अधिकमास (Adhikamaas) को मलमास और पुरुषोत्तम मास (Malamas and Purushottam Maas) भी कहा जाता है। इस मास में भगवान विष्णु (Lord Vishnu) की पूजा की जाती है।

नवरात्र (Navratri) में देरी के कारण इस बार दीपावली (Deepawali) 14 नवंबर को होगी । बता दें कि सूर्य और चंद्रमा के बीच संतुलन बना रह सके इसलिए अधिकमास (Adhikamaas) होता है। ऐसे में श्राद्ध पक्ष के ठीक एक महीने बाद यानी 17 अक्टूबर को कलश स्थापना होगी।मां दुर्गा को सर्वप्रथम शैलपुत्री (Maa Shailputri) के रूप में पूजा जाता है। नवरात्र के नौ दिनों में मां के अलग-अलग स्वरूप की पूजाकी जाती है। पहला दिन माता शैलपुत्री (Maa Shailputri) को समर्पित होता है। 

अधिकमास (Adhik maas) कब और क्यों आता है 

कहा जाता है कि एक सूर्य वर्ष 365 दिन होता है और करीब 6 घंटे का होता है, जबकि एक चंद्र वर्ष 354 दिनों का रहता है। दोनों साल के बीच लगभग 11 दिनों का अंतर है। ये अंतर हर तीन साल में लगभग एक महीने के बराबर हो जाता है। इसी अंतर को दूर करने के लिए हर तीन साल में एक चंद्र मास अतिरिक्त आता है, जिसे अधिकमास (Adhikamaas ) कहा जाता है।

Navratri 2020: नवरात्रि कब से शुरू होगी 

Navratri Din 1: प्रतिपदा माँ शैलपुत्री (Maa Shailputri) पूजा घटस्थापना 17 अक्टूबर 202 (शनिवार)

Navratri Din 2: द्वितीया माँ ब्रह्मचारिणी (Maa Brahmacharini) पूजा 18 अक्टूबर 202 (रविवार)

Navratri Din 3: तृतीय माँ चंद्रघंटा (Maa Chandraghanta) पूजा 19 अक्टूबर 2020 (सोमवार)

Navratri Din 4: चतुर्थी माँ कुष्मांडा (Maa Kushmanda) पूजा 20 अक्टूबर 2020 (मंगलवार)

Navratri Din 5: पंचमी माँ स्कंदमाता (Maa Scandamata) पूजा 21 अक्टूबर 2020 (बुधवार)

Navratri Din 6: षष्ठी माँ कात्यायनी (Maa Katyayani) पूजा 22 अक्टूबर 2020 (गुरुवार)

Navratri Din 7: सप्तमी माँ कालरात्रि (Maa Kalratri) पूजा 23 अक्टूबर 2020 (शुक्रवार)

Navratri Din 8: अष्टमी माँ महागौरी दुर्गा (Maa Mahagauri Durga) महा नवमी पूजा दुर्गा महा अष्टमी पूजा 24 अक्टूबर 2020 (शनिवार)

Navratri Din 9: नवमी माँ सिद्धिदात्री (Maa Siddhidatri) नवरात्रि पारणा विजय दशमी 25 अक्टूबर 2020 (रविवार)

Navratri Din 10: दशमी दुर्गा विसर्जन (Dashamee Durga Visarjan ) 26 अक्टूबर 2020 (सोमवार)

 

आपको नवरात्रि के पहले दिन का महत्व बताते हैं- 

पहला दिन माता शैलपुत्री (Maa Shailputri) को समर्पित होता है। पहले दिन माता शैलपुत्री (Maa Shailputri) की पूजा अर्चना कि जाती है। माता शैलपुत्री (Maa Shailputri) की पूजाके बाद  ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी, सिद्धिदात्री की (Brahmacharini, Chandraghanta, Kushmanda, Skandamata, Katyayani, Kalratri, Mahagauri, Siddhidatri) आराधना होती है। नवरात्रि का पहला दिन (Navaraatri ka pahala din ) देवी शैलपुत्री (Devi Shailputri) की उपासना का दिन है। देवी, पर्वतों के राजा शैल की सुपुत्री थीं इसलिए इनको शैलपुत्री (Shailputri) नाम दिया गया। माता प्रकृति की देवी हैं इसलिए नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री की आराधना की जाती है। मां शैलपुत्री (Maa Shailputri)  को देवी पार्वती ( Devi Parvati ) का अवतार माना जाता हैं। मां शैलपुत्री (Maa Shailputri) का वाहन बैल है । मां शैलपुत्री (Maa Shailputri) के दाएं हाथ में डमरू (Damroo)  और बाएं हाथ में त्रिशूल (Trishul) है। मां शैलपुत्री के मस्तक पर अर्ध चंद्र विराजित है। माता शैलपुत्री (Maa Shailputri) मूलाधार चक्र की देवी मानी जाती हैं।

माता शैलपुत्री (Maa Shailputri) योग की शक्ति द्वारा जागृत कर मां से शक्ति पाई जा सकती है। दुर्गा के पहले स्वरूप में शैलपुत्री मानव के मन पर नियंत्रण रखती हैं। चंद्रमा पर नियंत्रण रखने वाली शैलपुत्री उस नवजात शिशु की अवस्था को संबोधित करतीं हैं जो निश्चल और निर्मल है और संसार की सभी मोह-माया से परे है। देवी शैलपुत्री ( Devi Shailputri) महादेव कि अर्धांगिनी पार्वती (Ardhangini Parvati) ही है। ज्योतिषी मान्यता के अनुसार, मां शैलपुत्री (Maa Shailputri) चंद्रमा के दोष को दूर करती हैं। जिन लोगों का चंद्रमा कमजोर है, मन अशांत रहता है वैसे लोगों को माता के शैलपुत्री (Maa Shailputri) स्वरूप की आराधना करनी चाहिए। देवी शैलपुत्री  ( Devi Shailputri) की उपासना से चंद्रमा के दोष (Chandrma Dosh) दूर होते हैं।

शैलपुत्री का अर्थ (Shailputri ka arth) होता है पर्वत की बेटी ( Parvati ki beti) । सती के देह त्यागने के बाद उन्होंने अगले जन्म में शैलराज हिमालय की पुत्री के रूप में जन्म लिया और शैलपुत्री (Shailputri) कहलाईं। ये ही सती के नाम से भी जानी जाती हैं। उनकी एक मार्मिक कहानी है। 

एक बार जब प्रजापति ने यज्ञ किया तो इसमें सारे देवताओं को निमंत्रित (devataon ko nimantrit) किया, भगवान शंकर (Bhagvaan Shankar) को नहीं। सती (Sati) यज्ञ में जाने के लिए विकल हो उठीं। शंकरजी (Shankar ji) ने कहा कि सारे देवताओं को निमंत्रित किया गया है, उन्हें नहीं। ऐसे में वहां जाना उचित नहीं है। सती का प्रबल आग्रह देखकर शंकरजी (Shankar ji) ने उन्हें यज्ञ में जाने की अनुमति दे दी। सती (Sati) जब घर पहुंचीं तो सिर्फ मां ने ही उन्हें स्नेह दिया। बहनों की बातों में व्यंग्य और उपहास के भाव थे। भगवान शंकर (Bhagvaan Shankar) के प्रति भी तिरस्कार का भाव है। दक्ष ने भी उनके प्रति अपमानजनक वचन कहे। इससे सती को दुःख पहुंचा। वे अपने पति का यह अप मान न सह सकीं और योगाग्नि द्वारा अपने को जलाकर भस्म कर लिया। इस दारुण दुःख से व्यथित होकर शंकर भगवान (Bhagvaan Shankar) ने उस यज्ञ का विध्वंस करा दिया। यही सती अगले जन्म में शैलराज हिमालय की पुत्री के रूप में जन्मीं और शैलपुत्री कहलाईं  (Shailputri)। पार्वती और हेमवती (Parvati and Hemvati) भी इसी देवी के अन्य नाम हैं।

शैलपुत्री (Shailputri) का विवाह भी भगवान शंकर (Bhagvaan Shankar) से हुआ। शैलपुत्री शिवजी (Shailputri Shivji) अर्द्धांगिनी बनीं। इनका महत्व और शक्ति अनंत है। मां दुर्गा को सर्वप्रथम शैलपुत्री के रूप में पूजा जाता है। Navratri के पहले दिन मां शैलपुत्री (Maa Shailputri) की पूजा की जाती है। मां शैलपुत्री (Maa Shailputri) आप सभी भक्तों की सारी मनोकामना पूर्ण करे।  जय मां शैलपुत्री (Maa Shailputri) की।  

 

 

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